रक्तिम शाम

रक्तिम  शाम  ये ऐसी  मानो…

प्रकृति  की  प्याली  में  शराब  छलकती,

रक्त  टपकता  सुर्ख  साखों  से…

जब  ढलते  सूरज  की  किरणें  आ  टकराती,

बारिश  है  बर्फ  की  तो  क्या…

खून  से  सना  है  हर दरख़्त,

लहू  लुहान  हैं  सभी…

आसमान, धरती, दिशाएं, और  वक़्त।

Raqtim Shaam.

Raqtim shaam ye aisi mano…

prakriti ki pyali me sharab chalkati

Raqt tapakta surkh saakhon se…

jab dhalte suraj kee kirne aa takrati,

baarish hai baraf ki to kya…

Khoon se sana hai har darakht,

Lahoo luhan hain sabhi…

Aasman, dharti, dishayen, aur waqt

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Waiting to Wait…and Tea इंतज़ार—इंतज़ार का… और चाय

जिंदगी  जब  चाय  की  एक  प्याली से  दूसरी  तक  सिमट आती  है,

छोटी  होती  है, पर बहुत  लम्बी  हो  जाती  है…

अलसाई  चाहतें  चुस्कियों  में  तलाशती  हैं  चुस्तियाँ,

बेबाक  बेफिक्री नहीं, रह  जाती  हैं  सिर्फ  मायूसियां…

चाय  की  बिखरती  भीनी  भाप  में  भीगे  कुछ  सवालात  हैं,

कुछ  कश्मकश, कशिश, कुछ  ख्वाब  ख़यालात  हैं…

चाय  के  ऊफान सी  हैं  उफ  ये  ऊफनती  उल्झनें,

परेशान  हूँ, पीता  हूँ  मैं  उसे  या  वो  पीती  है  मुझे…

चाय  से  सने  सूने  सपनों  में  कोई  शामिल  नहीं  होता,

बेइंतहा  इंतज़ार, और  इंतज़ार  का  इंतज़ार  है  रहता…

Jindagi jab chai ki ek pyali se doosari  tak simat aati hai,

Choti hoti hai, par bahut lambi ho jaati hai…

Alsai chahten chuskiyon me talasti hain chustiyan,

Bebak befikri nahee, rah jaati hain sirf maayusiyan…

Chai ki bikharti bhini bhaap me bhhege kuch sawalat hain,

Kuch kashmakash, kashish, kuch khwab, khayalat hain…

Chai ke ufaan si hai uf ye ufanti uljhanen,

Pareshan hun, Peeta hun main use ya wo peeti hai mujhe…

Chai se sane soone lamhon me koi giraft nahee hota

Beintehaa intezaar, aur Intezaar ka Intezar hai rahta…

pic: clay banks-unsplash

 

लफ्जों  के  लिबास  नहीं  होते ! Words are Naked !

जो  बातें  कभी  जाहिर  नहीं  होती

खामोशियाँ  जिक्र  कर  जाती  हैं

लिहाज  का  क्या  कहें

लफ्जों  के  लिबास  नहीं  होते

काफिले  चलते  रहते  हैं

कारवां  जाता  है  गुजर 

क्या  खोया  क्या  पाया

रिश्तों  में  हिसाब   नहीं  होते

परछाइयां  धुँधली  हैं

पर  खोया  चेहरा  ढूँढ़ते  रहते  हैं

आईने  पे  सायों  की  जमी  हैं  परतें 

अधूरे  ख्वाब  कभी  पूरे  नहीं  होते

हवाएं  न  जाने  कहाँ  उड़ा  ले  जाती  हैं

परिंदे  परेशां  नहीं  होते

ऊंचे  आकाश  में  छुपी  है  समंदर  की  गहराई 

ख्यालों  के  कभी  दायरे  नहीं  होते

बनावटी  बातें  जो  हैं …उनसे

कभी  कभी  नमी  का  अंदेशा  तो  होता  है

पर  लफ्जों  की  धोकेबाज़ी  से

दिलों  के  रेगिस्तान  हरे  नहीं  होते

बेगानों  में  अपनों  को  खोजते  हैं

और  दूरियों  में  नजदीकियां

दहलीज  पे  खड़ी  ज़िन्दगी देती  है दस्तक    

धड़कनों  के  दरमियाँ  फासले  नहीं  होते

ख्वाइशों की हसरतों  से  हैरत  क्यूँ ,

फितरत  को  जब  हरकतों  से  फुर्सत  नहीं

उधार  की  ज़िन्दगी  से  नाराज  क्यूँ 

हमराज  अक्सर  हमसफ़र  नहीं  होते

क्या  इंसानियत  के  चर्चे 

क्या  हैवानियत  के  किस्से

शख़्शियत   के  कई  अंदाज  हैं  ये 

हासियों  में  बंटी   ज़िन्दगी  के  मायने  नहीं  होते

Pic : Amanda APS

आओ कभी… मेरी खिड़की में बैठो…Come Sometime… Sit in My Window

आओ  कभी … मेरी  खिड़की  में  बैठो…

कुछ  गाओ , कुछ  गुनगुनाओ

कुछ  हंसो , कुछ  मुस्कुराओ

कुछ  खिलखिलाओ , कुछ  फुसफुसाओ ;

और  आओ …

करें  कुछ  चुगलियां , कहें  कुछ  चुटकुले

करें  कुछ  कानाफूसी , लगाएं  कुछ  कहकहे

करें  कुछ  गपसप , और  कुछ  गिले शिकवे

कहें  कुछ  किस्से  सुने  सुनाये , कुछ  अनकहे ;

आओ  कभी  अलसाई  लसलसी सी  दोपहरी  में …

मेरी  गरम  अदरखि  चाय  के  घूंटो  में 

करवट  बदलती  खूबसूरत  कहानियों  की

चुनिंदा  चर्चरी  चुस्कियां  हैं ;

आओ  कभी  शबनमी  धुँधली  सी  शाम  ढले …

मेरी  पुरानी  रक्तिम  शराब  के  प्यालों  में 

सलवटें  और  खुमारियों  भरे

दबे -पावं  रिश्तों  के  नशीले  लम्हे  हैं ;

आओ  कभी  फटे  पन्नों  वाली  पुरानी  किताब  में …

ढूंढे  अपने  आप  को , या  फिर  खो  जाएँ ,

और  उसकी  लज़ीज़  लिपटवां  खुसबू  में

लपेट  लें  वो  अरमान  अर्सों  पुराने ;

आओ  सुलझा  लें  मांझे  को , जिसमे  उलझी  है …

पतंगो  सी  उमंगें  और  ख्वाहिशें ,

अतीत  की  मुंडेर  पे  बैठ  दो  पल …

आओ  करें  कुछ  ऎसी  बातें  मुलाकातें ;

आओ  कभी ऐ जिंदगी , के  एक  मुद्दत  हुई ,

आओ  के  सहला  जाओ , तुम  मुझे  बहला  जाओ ,

झरोके  मेरे  खुले  हैं , अपने  खोल  दो ,

झांको , मत  झिझको , मत  जाओ , रुक जाओ , रह  जाओ .

आओ  कभी … मेरी  खिड़की  में  बैठो …

कुछ  कहो …

या फिर कहने दो खामोशियों को…

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