इंतज़ार—इंतज़ार का…और चाय Intezaar—Intezaar ka… aur Chai

जिंदगी  जब  चाय  की  एक  प्याली से  दूसरी  तक  सिमट आती  है,

छोटी  होती  है, पर बहुत  लम्बी  हो  जाती  है…

अलसाई  चाहतें  चुस्कियों  में  तलाशती  हैं  चुस्तियाँ,

बेबाक  बेफिक्री नहीं, रह  जाती  हैं  सिर्फ  मायूसियां…

चाय  की  बिखरती  भीनी  भाप  में  भीगे  कुछ  सवालात  हैं,

कुछ  कश्मकश, कशिश, कुछ  ख्वाब  ख़यालात  हैं…

चाय  के  ऊफान सी  हैं  उफ  ये  ऊफनती  उल्झनें,

परेशान  हूँ, पीता  हूँ  मैं  उसे  या  वो  पीती  है  मुझे…

चाय  से  सने  सूने  सपनों  में  कोई  शामिल  नहीं  होता,

बेइंतहा  इंतज़ार, और  इंतज़ार  का  इंतज़ार  है  रहता…

 Intezaar—Intezaar ka… aur Chai

Jindagi jab chai ki ek pyali se doosari  tak simat aati hai,

Choti hoti hai, par bahut lambi ho jaati hai…

Alsai chahten chuskiyon me talasti hain chustiyan,

Bebak befikri nahee, rah jaati hain sirf maayusiyan…

Chai ki bikharti bhini bhaap me bhhege kuch sawalat hain,

Kuch kashmakash, kashish, kuch khwab, khayalat hain…

Chai ke ufaan si hai uf ye ufanti uljhanen,

Pareshan hun, Peeta hun main use ya wo peeti hai mujhe…

Chai se sane soone lamhon me koi giraft nahee hota

Beintehaa intezaar, aur Intezaar ka Intezar hai rahta…

Image: Clay Banks–unsplash

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